मैसूर के शेर टीपू सुल्तान हिस्ट्री इन हिंदी

मैसूर के शेर टीपू सुल्तान हिस्ट्री इन हिंदी  


Tipu sultan
टीपू सुल्तान 


शेर की एक दिन की जिंदगी, 
गीदड़ की सौ साल की जिंदगी से बेहतर है


ये मुहावरा तो आप लोगों ने कहीं न कहीं सुना ही होगा लेकिन क्या आपने सोचा की यह मुहावरा सबसे पहेले किसने बोला था| दोस्तों यह मुहावरा है शेर-ए-मैसूर टीपू सुल्तान का|


Tipu sultan in Hindi

आज में आप लोगों को उस मैसूर के शेर टीपू सुल्तान की हिस्ट्री बताऊंगा जो अपने देश के लिए यानि भारत के लिए अंग्रेजों के साथ आखरी दम तक लड़ता रहा और अंग्रेजों के खिलाफ लड़ते हुए शहीद होनेवाला पहेला सेनापति बना|


ये वही टीपू सुल्तान हैं जिनको शहीद करने के बाद उनकी लाश पर खड़े होकर अंग्रेजों के जनरल ने कहा था की आज से यह भारत हमारा हुआ|


ये वही टीपू सुल्तान हैं जो जब तक जिन्दा रहे तब तक भारत और अंग्रेजों के बीच एक दीवार बनके खड़े रहे|


जिस दिन अंग्रेज टीपू सुल्तान के महल में ही रहेनेवाले गद्दारों की मदद से टीपू सुल्तान को शहीद करने में कामयाब हो गए थे उसी दिन से धीरे धीरे पुरे हिंदुस्तान पर अंग्रेजों का कब्ज़ा होना शुरू हो गया था| जिसके बाद एक दिन वो भी आया की जब पुरे भारत पर अंग्रेजों का कब्ज़ा हो गया|


आज ऐसा समय आ चूका है की जिस इंसान ने हमारे देश को अंग्रेजों से बचाने के लिए बहोत सारी कुर्बानियाँ दी आज उसी इंसान के इतिहास को हमारी किताबों से मिटाया जा रहा है|


लेकिन मिटानेवाले ये नहीं जानते की हिस्ट्री एक ऐसी चीज है जिसे लिखा नहीं जाता क्यूंकि लिखी हुई चीजे मिटा दी जाती है, हिस्ट्री तो बनायीं जाती है और हिस्ट्री बनाते भी वही लोग हैं जो हिस्ट्री बनाने के काबिल होते हैं|


लोगों के मन में टीपू सुल्तान से जुड़े बहोत सवाल आते हैं की टीपू सुल्तान कौन थे ?, उन्होंने अपनी जिंदगी कैसे गुजारी ? और उन्होंने हमारे देश भारत को अंग्रेजों से कैसे बचाके रखा था ?


Tipu Sultan


Tipu Sultan Kaun Tha ?

टीपू सुल्तान हैदर अली के सबसे बड़े बेटे थे, उनकी माँ का नाम फखरुन्निशा था, उनकी त्वचा का रंग काला था और शरीर का कद छोटा था| 


हैदर अली जितने बहादुर थे उतने ही ज्यादा होशियार भी थे| इन्होने अंग्रेजों से 50 साल तक मुकाबला किया था और अंग्रेजों को नोर्थ इंडिया पर कब्ज़ा करने से रोके रखा था|


हैदर अली की सबसे बड़ी ताकत उनका बड़ा बेटा टीपू सुल्तान था| टीपू सुल्तान को हैदर अली का दाहिना हाथ माना जाता था|  


टीपू सुल्तान जब छोटे थे तब अंग्रेज भारत में अपने पैर पसारने की कोशिश कर रहे थे| टीपू सुल्तान के पिता ने उनकी परवरिश का एक अच्छा इन्तेजाम किया था और उनकी तालीम के लिए बड़े बड़े टीचर्स को दूर दूर से बुलवाया गया था|


कहा जाता है की उनको अरबी, फारसी, हिंदी, इंग्लिश, फ्रेंच, उर्दू और तमिल जैसी कई भाषाएँ आती थी| इसके साथ साथ उनको बचपन से ही घुड़सवारी, तीरंदाजी, तलवारबाजी और नेजाबाजी जैसी चीजों में भी महारत हांसिल थी|


1769 में अंग्रेजों ने एक ऐसी बंदरगाह पर कब्ज़ा कर लिया था जो टीपू सुल्तान की सल्तनत में आती थी और उस जगह से उन्होंने अपना कंट्रोल खो दिया लेकिन टीपू सुल्तान इस हादसे की वजह से चेन से नहीं रह पा रहे थे और फिर उन्होंने अपने पिता के साथ मिलकर उस जगह को जितने की ठान ली|


इसके बाद दूसरा एंग्लो मैसूर वॉर शुरू हो गया जिसमे टीपू सुल्तान ने अपने पिता हैदर अली के साथ मिलकर अंग्रेजों को खदेड़ दिया|


1780 एक बार फिर अंग्रेजों ने जंग छेड़ दी लेकिन इस बार भी टीपू सुल्तान ने अपने पिता के साथ 90 हजार का लश्कर लेकर बेंगलोर पहोंचे और इस जंग में भी टीपू सुल्तान ने अंग्रेजों को धुल चटा दी|


यह हार अंग्रेजों के लिए इतनी खतरनाक हार साबित हुई की इसका असर सीधा ब्रिटन तक हुआ|


Tipu Sultan
टीपू सुल्तान की तलवार 


Tipu Sultan ka Itihas

7 दिसम्बर 1782 को हैदर अली का इन्तेकाल (मृत्यु) हो गया| इस वक़्त टीपू सुल्तान की उम्र 22 साल की थी| यानि 22 साल की उम्र में टीपू सुल्तान के सर पर सल्तनत का भार आ गया था|


इतनी कम उम्र में मैसूर के तख़्त पर बैठने के बाद उनपर कई मुसीबतें आ गयी थी जिनमे सबसे बड़ी मुसीबत अंग्रेज थें|


टीपू सुल्तान बहादुरी और होशियारी में अपने पिता से बहोत आगे थे| वे हंमेशा एक आम इंसान की तरह रहा करते थे|


वो दुसरे बादशाहों की तरह पीछे खड़े होकर अपने सिपाहियों को हुक्म नहीं दिया करते थे बल्कि वो हर जंग में सबसे आगेवाली लाइन में खड़े होकर अपने सिपाहियों के साथ लड़ा करते थे|


अंग्रेज बार बार कोशिश करते लेकिन टीपू सुल्तान को हरा नहीं पाते थे| टीपू सुल्तान की होशियारी के आगे अंग्रेजों की तमाम शाजिशें नाकाम हो जाती थीं| 


टीपू सुल्तान की हिस्ट्री में एक वक़्त ऐसा भी आया जब अंग्रेजों को टीपू सुल्तान से संधि (समजोता) करनी पड़ी और इस संधि में टीपू सुल्तान ने जो शर्तें रखीं वो सब अंग्रेजों को माननी पड़ी और यह हिंदुस्तान के इतिहास में पहेली बार हुआ था जब कोई हिन्दुस्तानी अंग्रेजों पर इतना भरी पड़ा था|


टीपू सुल्तान की जो जल सेना थी वो उस समय की सबसे मजबूत जल सेना मानी जाती थी|


टीपू सुल्तान को ही इस दुनिया का सबसे पहेला मिसाइल मेन माना जाता है| भारत में परमाणु बम का अविष्कार करनेवाले डॉ ए पि जे अब्दुल कलाम के मुताबिक टीपू सुल्तान ही दुनिया का सबसे पहेला इंसान था जिसने रोकेट टेक्नोलॉजी पर काम किया था|


टीपू सुल्तान की रोकेट टेक्नोलॉजी के जरिये से ही इस दुनिया ने रोकेट को बनाना सिखा था| अंग्रेजों ने बाद में जितने भी रोकेट बनाये थे वो टीपू सुल्तान की टेक्नोलॉजी का उपयोग करके ही बनाये थे| टीपू सुल्तान को शहीद करने के बाद अंग्रेज उनकी टेक्नोलॉजी इंग्लैंड ले गए थे|


टीपू सुल्तानने रोकेट की खोज करने के साथ जंग करने के नए नए तरीके भी खोजे थे| उन्होंने जंग करने के तरीकों पर एक किताब भी लिखी थी जिसका नाम था फतह-उल-मुजाहिदीन| फतह-उल-मुजाहिदीन हिंदुस्तान की पहेली किताब थी जो जंग करने के तरीकों को सिखाने के लिए लिखी गयी थी|


टीपू सुल्तान ने अपनी सल्तनत में अपने नाम के सिक्के शुरू करवाए थे| उस समय तुर्की में मौजूद सल्तनत-ए-उस्मानिया (OTTOMAN EMPIRE) जैसी बड़ी सल्तनत भी उनको बहोत अहेमियत दिया करती थी|


जब अंग्रेजों के खिलाफ लड़ने के लिए टीपू सुल्तान को सिपाहियों की जरुरत पड़ी तो उन्होंने सल्तनत-ए-उस्मानिया से मदद की गुहार लगाई थी जिसके बदले उस समय के सल्तनत-ए-उस्मानिया के सुल्तान ने टीपू सुल्तान की बहोत मदद की थी|


जब अंग्रेजों को इस बात का यकीन हो गया था की हम टीपू सुल्तान का मुकाबला खुले मैदान में नहीं कर सकते हैं तो उन लोगों ने दूसरा तरीका अपनाया और उन्होंने पैसों का लालच देकर हिंदुस्तान में रहेनेवाले गद्दारों को ढूँढना शुरू कर दिया|


इस समय हिंदुस्तान की दो बड़ी सल्तनतें मुग़ल और मराठा अंग्रेजों के सामने बहोत कमजोर पड़ चुके थे और इस समय जो सल्तनत अंग्रेजों के लिए खतरा थी वो टीपू सुल्तान की सल्तनत-ए-मैसूर ही थी|


अंग्रेजों को कुछ गद्दार मिल भी गए| टीपू सुल्तान के महल में रहेनेवाला उनका बहोत करीबी जिसका नाम मीर सादिक था उसने लालच में आकर अंग्रेजों से हाथ मिला लिया और इसके साथ उस वक़्त के हैदराबाद के निजाम और मराठाओं ने भी अंग्रेजों के साथ हाथ मिला लिया था|


मीर सादिक टीपू सुल्तान का सबसे खास वजीर था| मीर सादिक हैदर अली के दौर में एक बाजार में आम कोतवाल हुआ करता था लेकिन हैदर अली ने मीर सादिक को एक शहर का सुबेदार बना दिया था क्यूंकि मीर सादिक बहोत ही होशियार और चालक आदमी था|


मीर सादिक की होशियारी और चालाकी को देखकर हैदर अली ने उसे अपना खास वजीर बना लिया था| उसे हैदर अली ने अपनी सल्तनत के सारे माल और खजाने की देखरेख का काम दे दिया था|


टीपू सुल्तान का समय आते आते मीर सादिक ने सल्तनत के खजाने में बहोत जयादा गड़बड़ी कर दी थी और जब इस बात की खबर टीपू सुल्तान तक पहोंचाई गयी तो टीपू सुल्तान ने तुरंत इसकी जांच का आदेश दे दिया|


जांच में मीर सादिक मुजरिम साबित हुआ और उसके घर से लाखों रूपये का काला धन मिला| यह देखकर टीपू सुल्तान ने तुरंत मीर सादिक को वजीर के पद से हटा दिया और उसका पूरा काला धन जब्त कर लिया|


मीर सादिक एक चालाक इंसान था उसने एक बार फिर टीपू सुल्तान से मुलाकात की और उनसे माफ़ी भी मांगी| मीर सादिक ने कुरान पर हाथ रखकर ये कसम भी खायी की वो आगे खभी भी ऐसी कोई हरकत नहीं करेगा जिससे उनको या सल्तनत को कोई परेशानी हो|


टीपू सुल्तान रहमदिल और नेक इंसान थे इसीलिए उन्होंने मीर सादिक को माफ़ कर दिया और फिरसे उसे अपना खास वजीर बना लिया|


लेकिन उस समय टीपू सुल्तान को इस बात का जरा भी अहसास नहीं था की जिस इंसान को वो आज माफ़ कर रहे हैं वो आनेवाले दिनों में इतनी बड़ी गद्दारी करेगा की इसका नुकशान सल्तनत-ए-मैसूर को ही नहीं पुरे भारत को होगा|


मीर सादिक ने भले ही टीपू सुल्तान से माफ़ी मांग ली थी लेकिन उसके दिल में बदला लेने की आग अब और ज्यादा बढ़ गयी थी और मीर सादिक अब एक मौका ढूंढ रहा था|


मीर सादिक को अंग्रेजों की शकल में टीपू सुल्तान के खिलाफ मौका मिल भी गया| अंग्रेजों ने मीर सादिक को हुकूमत का लालच दिया और ये वादा किया की टीपू सुल्तान को ख़त्म करने के बाद तुमको ही मैसूर का अगला बादशाह बनाएंगे|


इस शर्त पर मीर सादिक राजी हो गया और उसने अंधरुनी तौर पर टीपू सुल्तान की सल्तनत को बर्बाद करना शुरू कर दिया|


मीर सादिक दूसरी सल्तनत से आये खत को पहेले खुद पढ़ लिया करता था और उस खबर को अंग्रेजों तक पहोंचा दिया करता था इससे टीपू सुल्तान को बहोत नुकशान हुआ करता था|


जिसके बाद अंग्रेजों की फ़ौज, मराठाओं की फ़ौज और हैदराबाद के निजाम की फ़ौज ने मिलकर टीपू सुल्तान की फ़ौज पर हमला कर दिया|


टीपू सुल्तान को जब इस बड़े हमले की खबर मिली तब वो खाना खा रहे थे| इस हमले की खबर सुनते ही टीपू सुल्तान तुरंत खाना छोड़कर खड़े हो गए|


उनके कुछ वफादार सिपाहियों ने उनको यह मशवरा दिया की सुल्तान इस वक़्त हमारे पास मुट्ठीभर ही फ़ौज है इसलिए बहेतर यह होगा की आप इस महल के ख़ुफ़िया रास्तों से बहार निकल जाए और अपनी जान बचा लें|


Tipu Sultan Biography in Hindi 

लेकिन टीपू सुल्तान ने उस समय अपने वफादार सिपाहियों से यह ऐतिहासिक अल्फाज कहे थे "शेर की एक दिन की जिंदगी, गीदड़ की सौ साल की जिंदगी से ज्यादा बहेतर है”|


अंग्रेजों के लिए एक मुसीबत यह भी थी की उन्हें यह नहीं मालूम था की टीपू सुल्तान कौन है क्यूंकि मेने आपको पहेले भी बता दिया है की टीपू सुल्तान एक आम इंसान की तरह रहा करते थे और जंग में भी वो एक आम सिपाही की तरह ही लड़ा करते थे|


अंग्रेजों की इस परेशानी को भी मीर सादिक ने ख़तम किया और इशारे में यह बता दिया की इन सिपाहियों में असली टीपू सुल्तान कौन है|


मीर सादिक जंग के मैदान से भागता हुआ सीधा महल की तरफ गया और महल के सारे दरवाजे बंध कर दिए ताकि टीपू सुल्तान महल में ना जा सकें|


अपने मुट्ठीभर सिपाहियों के साथ अंग्रेजों के खिलाफ लड़ते लड़ते 4 मई 1799 को टीपू सुल्तान ने इस दुनिया को अलविदा कहा| इस तरह टीपू सुल्तान अंग्रेजों के खिलाफ लड़ते लड़ते शहीद होनेवाले पहेले शाशक बने|


Tipu Sultan Death Photo
टीपू सुल्तान की मृत्यु के समय की तस्वीर


टीपू सुल्तान से अंग्रेज इतना डरते थे की जब टीपू सुल्तान शहीद हो गए तो उसके कुछ देर बाद भी अंग्रेजों में इतनी ताकत नहीं थी की वो उनकी लाश के पास जा सके|


आपको पहेले ही बता दिया की टीपू सुल्तान के शहीद होने के बाद उनकी लाशपर खड़े होकर अंग्रेजों के जनरल ने यह बात कही थी की “आज से हिंदुस्तान हमारा हुआ”| टीपू सुल्तान को शहीद करने के बाद लंदन में एक बड़ा जश्न मनाया गया था|


जंग ख़तम होने के बाद जब मीर सादिक अंग्रेजों से मिलने जा रहा था तब रस्ते में उसे मैसूर की जनता और टीपू सुल्तान के बचे हुए सिपाहियों ने घेर लिया और उसे इतनी बुरी तरह से मारा की उसकी वहीँ पर मौत हो गयी|


टीपू सुल्तान को हर इंसान स्वतंत्रसेनानी मानता है लेकिन कुछ सालों से इस नफरत की राजनीती का असर टीपू सुल्तान पर भी पड रहा है|       


आप लोगों को टीपू सुल्तान की हिस्ट्री कैसी लगी Comment करके जरूर बताएं|

 


                
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